सर्व धर्मान्परित्यंज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।। गीता 15:66) |
महानुभाव धर्म, परमेश्वर की अनन्य भक्ति में विश्वास करता है। धर्मानुसार परमेश्वर नित्य, व्यापक और सर्वशकितमान है। परमेश्वर सृषिट का कर्ता-धर्ता और हर्ता है। ईश्वर ही जीवों और देवताओं का शासक है और जीवों को जन्म-मृत्यु से छुड़ा सकता है।
यह धर्म पूर्ण द्वैतवाद पर आधारित है। भगवान श्री चक्रधर महाराज के अनुसार चार अनादि और नित्य तत्व - पदा॔थ है- जीव, देवता, प्रपंच और परमेश्वर ये चारों पदार्थ मूल सृषिट से पहले विधमान है।
आज से लगभग 5215 वर्ष पूर्व द्वापर युग में निगु॔ण निराकर ईश्वर स्वरूप, श्रीकृष्ण रूप में अवतरित हुए। वह सोलह कला सम्पूर्ण ईश्वरीय अवतार थे। वहाँ श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध से पूर्व कुरुक्षेत्र में अपने प्रिय सखा अजु॔न को गीता रूपी, ईश्वरीय ज्ञान दिया परन्तु समय-समय के साथ इस ज्ञान का स्वरूप ही विकृत हो गया। विद्वानों ने इस ज्ञान को अपने-अपने ढंग से लिया। परमेश्वर के बारे में भी अनेक भ्रानितयाँ फैल गईं। परमेश्वर ने लगभग 800 वर्ष पूर्व इस कलियुग में श्री चक्रधर रूप में अवतरित हो उसे ईश्वरीय ज्ञान की पुनस्र्थापना कर जीवों का कल्याण कार्य आरम्भ किया।
गीता के अनुसार इस सृषिट में अनेक देवता हैं, और देव लोक भी अनेक हैं। देवता अपने भक्तों को अपने सामथ्र्य अनुसार फल प्रदान करते हैं परन्तु देवताओं के फल नाशवान होते हैं। देवता भक्त देवलोकों से नियत समय तक सुख-दुख भोगकर फिर नीचे मृत्युलोक में आते हैं। जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाने की शकित देवताओं में नहीं है। मुकित केवल ईश्वर की ज्ञान पूर्वक अनन्य भकित से ही प्राप्त हो सकती है। गीतानुसार ब्रह्रालोक तथा स्वर्ग आदि जितने लोक हैं सब पुन:-पुन: जन्म देने वाले लोक हैंं।